मुक्ति क्या है?

जब हम कुछ देखते हैं, कुछ जानते हैं, या कुछ समझने की कोशिश करते हैं, तभी एक प्रकार का बंधन बन जाता है। क्योंकि उसी क्षण हम अपने स्वभाव से बाहर निकल जाते हैं|  

हमारा मन हमेशा कुछ न कुछ देखना, समझना और पकड़ना चाहता है। लेकिन यही कोशिश हमें उलझा देती है।

तो फिर मुक्ति क्या है?

मुक्ति का अर्थ है —

कुछ भी देखने की आवश्यकता न रहे।

कुछ जानने या समझने की इच्छा न रहे।

यहाँ तक कि यदि भगवान भी सामने आ जाएँ, कोई प्रकाश दिखाई दे, या कोई भी अनुभव हो — तब भी उसे पकड़ने या देखने की जरूरत नहीं है।

मुक्ति का सार यही है कि

कुछ देखने की चाह नहीं,

कुछ जानने की कोशिश नहीं,

कुछ समझने का प्रयास नहीं।

जब देखने, जानने और समझने की दौड़ रुक जाती है, तब मन स्वाभाविक रूप से शांत हो जाता है।

सबसे सरल बात यही है —

कुछ न देखना,

कुछ न जानना,

कुछ न समझना।

इसमें कोई प्रयास नहीं है।

क्योंकि प्रयास तो देखने में लगता है,

जानने में लगता है,

समझने में लगता है।

जब प्रयास ही समाप्त हो जाता है,

तभी सच्ची मुक्ति प्रकट होती है।