आत्मज्ञान क्या है?
अक्सर हम जिसे आत्मज्ञान समझते हैं, वास्तव में वह आत्मज्ञान नहीं होता। इसलिए पहले यह समझना ज़रूरी है कि आत्मज्ञान वास्तव में क्या है।
जब हम कहते हैं कि यह देह (शरीर) है, तो सोचिए—क्या हमें पहले शरीर का ज्ञान होता है या पहले ज्ञान होता है?
यदि ज्ञान ही न हो, तो हम इसको शरीर कैसे कह पाएँगे?
इसी तरह हम कहते हैं कि मन है, बुद्धि है।
लेकिन वास्तव में पहले ज्ञान होता है, फिर उसी ज्ञान को हम अलग-अलग नाम दे देते हैं—मन, बुद्धि, शरीर।
अब सोचिए—जब हम कहते हैं धरती, आकाश, तो क्या हम वास्तव में वस्तुओं को देख रहे हैं या उनके बारे में हो रहे ज्ञान को पहचान रहे हैं?
दरअसल जो कुछ भी अनुभव में आ रहा है, वह सब ज्ञान के माध्यम से ही आ रहा है।
यह ज्ञान क्या कभी रुकता है?
क्या ऐसा होता है कि किसी समय ज्ञान हो रहा है और किसी समय नहीं?
नहीं, ज्ञान तो निरंतर चलता रहता है।
यानी हर क्षण हमें किसी न किसी रूप में ज्ञान हो रहा है।
जब आप कहते हैं “मैं हूँ”, तो यह भी ज्ञान के कारण ही संभव है।
यदि ज्ञान ही न हो, तो “मैं हूँ” यह अनुभव भी नहीं हो सकता।
इसी ज्ञान को कभी हम शरीर कहते हैं, कभी मन, कभी बुद्धि।
इसी को हम तुम, मैं, या परमात्मा भी कह देते हैं।
सच्चाई यह है कि हर नाम के पीछे मूल में ज्ञान ही है।
इसलिए ज्ञान पर कोई लेबल लगाने की आवश्यकता नहीं है।
सिर्फ इतना देखना है कि ज्ञान हो रहा है।
जब हम केवल इस सत्य को पहचान लेते हैं कि
ज्ञान हो रहा है, और उसी ज्ञान का ज्ञान हो रहा है,
तभी वास्तविक आत्मज्ञान प्रकट होता है।
ज्ञान का ज्ञान ही आत्मज्ञान है।